Friday, 2 November 2018

जय भीम का क्या मतलब है

जय भीम का क्या मतलब है

Jai Bheem Ka Mtlb
जय भीम का क्या मतलब है

ये जय भीम क्या है ,जय भीम एक ऐसा नारा है जो राजनीतिक दल सामाजिक संगठन रैलियों में विरोध प्रदर्शनों में अंबेडकरवादी लोग आदि जय भीम का नारा अवश्य लगाते हैं, या जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से मिलती हैं तो जय भीम बोल के अभिवादन करते हैं
“अक्सर जो गैर अंबेडकरवादी हैं वह पूछा करते हैं कि भाई तुम जय भीम जय भीम क्यों बोलते हो इसका क्या मतलब होता है” कुछ लोग तो जय भीम का मतलब यह सोचते हैं कि महाभारत में एक पात्र  भीम  था जिससे लोग समझते है कि यह एक काल्पनिक पात्र है जिसे लोग जय भीम बोलते हैं महाभारत में अक्सर कम ही लोग हैं जो जय भीम का मतलब सही अर्थ में जानते हैं,जय भीम का मतलब बताने से पहले मैं जय भीम शब्द की उत्पत्ति के बारे में  बताना चाहता हूं जय भीम शब्द का प्रयोग सबसे पहले बाबू हरदास ने किया था बाबू हरदास एल. एन. ने 6 फरवरी 1935 को “समता सैनिक दल“ के नाम पर एक पत्र लिखा था जय भीम का प्रचार प्रसार  अछूतो में जाकर करना है बाबू हरदास  एक पक्के अंबेडकरवादी थे।
वे बाबा साहब डॉ अंबेडकर के आंदोलन के साथ काम कर रहे थे।  एक बार जब मुस्लिम साथी कहीं जा रहे थे तब एक मुस्लिम व्यक्ति  दूसरे मुस्लिम व्यक्ति से अस्सलाम वालेकुम बोल रहे थे और जवाब में वालेकुम सलाम बोल कर निकल रहे थे तब उस समय उनके मन में विचार आया  और सोचा कि हमें भी कुछ ऐसा बोलना चाहिए जिससे हमारी पहचान हो तो उन्होंने जय भीम बोलने की शुरुआत की जय भीम बोलने लगे जवाब में बल भीम बोलने लगे । इसी कारण से जय भीम का उदय हुआ शुरुआत में जय भीम बल भीम चला लेकिन समय के साथ बल भीम  का प्रचलन कम हो गया लेकिन जय भीम बोलने का प्रचलन अभी भी जारी है 1949 के बाद डॉक्टर अंबेडकर ने अपनी पुस्तक था कुछ  पत्रों में जय भीम लिखने लगे थे ।
जब जब विरोध प्रदर्शनों में जय भीम का नारा लगता है तो दुश्मनों के सीने में आग लगती है जय भीम एक ऐसा नारा है  जो फुले शाहू आंबेडकर के आंदोलन को बढ़ाने में यह नारा रीड की हड्डी का काम कर रहा है।
       जय भीम का शाब्दिक मतलब है डॉक्टर अंबेडकर की जीत जय भीम डॉक्टर अंबेडकर के लिए प्रत्येक सम्मान का प्रतीक है जय भीम बहुजन समाज की आवाज बन चुकी है कि हर सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, मुक्ति के लिए जगाने का काम कर रहा है जय का नारा लगाते ही अन्याय के प्रति ,दायित्व के प्रति, एक ताकत का एहसास होता है जय बहुजन समाज की आवाज है

इसलिए गर्व से बोलो “जय भीम”

Friday, 5 October 2018

बहुजन समाज का क्या मतलब है ...

       बहुजन समाज का क्या मतलब है

Bahujan Samaj
Bahujan Samaj
अक्सर लोग यह सोचते रहते हैं कि अंबेडकरवादी लोग ज्यादातर बहुजन शब्द का प्रयोग क्यों करते हैं आखिर बहुजन का मतलब क्या है या बहुजन केवल अनुसूचित जाति जनजाति के लिए या सीधे शब्दों में बोले तो चमार भंगी बसोर लोगों को बहुजन बोलते होंगे अक्सर मैंने लोगों को बोलते देखा है .

बहुजन शब्द का इतिहास :-

बहुजन शब्द का प्रयोग सबसे पहले महामानव तथागत गौतम बुद्ध ने किया था बहुजन शब्द ( त्रिपिटक )से लिया गया है , भगवान बुद्ध ने कहा है बहुजन हिताय बहुजन सुखाय जो कि बहुजन समाज पार्टी का 2007 से पहले यह नारा रहा है । भगवान बुद्ध के समय में बहुजन शब्द का मतलब बहुसंख्यक (Majority) होता है, बहुजन अर्थात अधिक से अधिक संख्या वाले लोग होता है , भगवान बुद्ध ने कहा बहुजन हिताय बहुजन सुखाय मतलब अधिक से अधिक लोगों का हित तथा सुख हो ।

भारतीय राजनीति में बहुजन शब्द :-

भारतीय राजनीति में बहुजन शब्द का प्रयोग बामसेफ DS4 तथा बीएसपी के संस्थापक कांशीराम जी ने बहुजन शब्द का प्रयोग किया, उन्होंने बहुजन शब्द को इतना ज्यादा प्रचारित,प्रसारित किया कि लोगों की जुबान पर बहुजन शब्द का नाम आ गया, बहुजन शब्द का मतलब अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग तथा धार्मिक अल्पसंख्यक जैसे मुस्लिम,सिख,ईसाई जैन,बौद्ध,पारसी को कहा गया है जिनकी संख्या से देश में 85% है, इन वर्गों को एक करके बहुजन समाज कहा गया है ।
कांशीराम जी ने मनु द्वारा निर्मित चतुर्वर्णीय व्यवस्था में जिसमें ब्राह्मण,क्षत्रिय वैश्य तथा शुद्र वर्ण इन चार भागों में बांटा गया । तथा तथा शुद्र वर्ण को मनु ने 6743 जातियों के टुकड़ों के टुकड़ों में बांट दिया तथा उन 6743 टूटी हुई जातियों को एक करके अल्पजन से बहुजन बनाने की कोशिश कांशीराम जी ने की, जिसे बहुजन समाज कहा गया , तथा बहुजन समाज के महापुरुषों को प्रांतीय स्तर से उठाकर राष्ट्रीय स्तर पर बहुजन महापुरुषों को एक करके, नई पहचान दिलाई । बहुजन समाज का मतलब है इस देश का 85% बहुसंख्यक आबादी वाला बहुजन समाज जिनको जाति तथा उपजातियों में बांटा गया । बहुजन शब्द के माध्यम से इस देश की 85% SC,ST,OBC तथा माइनॉरिटी को एक सूत्र में बांधने की कोशिश कांशीराम जी ने की ।
बहुजन समाज का नाम देने की जरूरत है, इसलिए हुई क्योकि इस 85% आबादी वाला (बहुसंख्यक) बहुजन समाज सामाजिक,आर्थिक, राजनीतिक रूप से शोषण होता रहा है।
26 जनवरी 1950 संविधान लागू होने के बाद इस 85% बहुजन समाज का शोषण होना बंद नहीं हुआ तथा संविधान लागू होने से पहले 85% समाज पर 15% वाले मनुवादियों का राज कायम था ,और संविधान लागू होने के बाद भी 15% वालों का देश में राज रहा तथा तथा बहुजन समाज की वोटों की लूट हुई, इस 85% बहुजन समाज को एक करके ,15% वालों का राज हटाकर 85% वाली बहुसंख्यक बहुजन समाज का सत्ता पर कायम करने की कोशिश कांशीराम जी ने की तथा भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सफलता भी मिली ।
हमारी 85% जनसंख्या वाले बहुजन समाज को जातियों के आधार पर तोड़े हुए लोगों को एक करके बहुजन समाज को देश का शासक बना कर 85% गरीब शोषित पीड़ित लोगों का उद्धार करना होगा ।

Must Read:- Occupation Of Hindu Religion In Government Institutions

Wednesday, 12 September 2018

आरक्षण एक सोच तथा गलतफहमी PART 1

Reservation Policy
आरक्षण एक सोच तथा गलतफहमी PART 1

  आरक्षण एक सोच तथा गलतफहमी PART 1

आरक्षण एक ऐसा विषय है जिस विषय पर सबसे ज्यादा चर्चा और राजनीति होती है । आरक्षण लगभग हर चुनाव में  किसी ना किसी रूप में चुनावी मुद्दा रहता है आरक्षण के
मुद्दे पर राजनैतिक दल चुनाव हारते और जीतते रहते हैं। आरक्षण का मूल उद्देश्य विभिन्न वर्गों के बीच में व्याप्त असमानता को दूर कर समानतावादी समाज की स्थापना करना है। हमारे भारत देश में प्राचीन काल (पुराने समय) से ही भेदभाव पूर्ण और अन्याय पूर्ण वर्ण व्यवस्था बना दी गई थी। समाज को अवैज्ञानिक (बेतुका) तौर पर चार भागों या वर्णों में बांट दिया गया था। यह वर्ण थे (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य,और शुद्र) वेदों में और धार्मिक पुस्तकों में शूद्रों को केवल एक ही अधिकार दिया गया था। वह अधिकार है तीन वर्णों की बगैर स्वार्थ के सेवा करना। धार्मिक पुस्तकों में शूद्र वर्ण को नीच वर्ण कहकर कई जगह उसका घोर अपमान किया गया है। जैसे कि तुलसीदास ने रामचरित-मानस के पेज क्रमांक 986 में चौपाई नंबर 3 में लिखा है।
“जे वरनाधम तेली कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।।
नारि  मुई गृह सम्पति नासी । मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी।।
ते विप्रन्ह सन आपु पूजवाहि। अभय लोक निज हाथ नासवहिं ।।”
अर्थात:-  तेली ,कुम्हार चांडाल, भील ,कोल,और कलवार आदि जो वर्ण में नीचे है, स्त्री के मरने पर अथवा घर की संपत्ति नष्ट हो जाने पर सिर मुंडवाकर संयासी हो जाते हैं। वे अपने को ब्राह्मणों से पुजवाते है। और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं।

पुराने समय में वेदों और धार्मिक पुस्तकों को संविधान का दर्जा प्राप्त था । इन्हीं धार्मिक पुस्तकों में लिखे अनुसार राजा राज्य करते थे आरक्षण की शुरुआत इसी काल  से मानी जाती है ।
मनुस्मृति के अनुसार पुरोहित के पद, राजा के प्रमुख सलाहकार, दंडाधीश के पद, तथा मंत्रियों के पद, ब्राह्मणों के लिए आरक्षित थे सभी महत्वपूर्ण पद ब्राह्मणों के लिए सुरक्षित थे सारे मंत्री ब्राह्मण ही होते थे। गैर ब्राह्मण जातियां बड़े पदों पर नहीं पहुंच सके इसलिए शिक्षा पर एकाधिकार जमाये रखने के लिए विधान बनाया गया । हिंदू समाज के निम्न वर्गों के लोगों तथा ब्राह्मण सहित सभी वर्गों की  महिलाओं के लिए पढ़ाई लिखाई अपराध घोषित कर दिया जिसका उल्लंघन करने पर कठोर दंड का प्रावधान था ।
मनुस्मृति के भाग 2 के श्लोके नंबर 67 में लिखा है:-
श्लोक:-
वैवाहिको स्त्रींणा: संस्कारो वैदित स्मृत।
पति सेवा गुरौ वासो गृहार्थी अग्नि परिक्रिया।।

अर्थात:- जैसे शूद्रों के लिए गुरु की दीक्षा (जनेऊ संस्कार) करना मना है । उसी प्रकार स्त्रियों के लिए भी पढ़ना-पढ़ाना गुरु दीक्षा लेना मना है ।

प्राचीन काल में ऐसी भेदभाव पूर्ण शासन  व्यवस्था तथा शिक्षा के अभाव के कारण महिलाएं (सभी वर्णों की) आदिवासी, पिछड़ा वर्ग और दलित इन सभी की हालत इतनी दयनीय और सोचनीय हो गई थी कि इसकी मिसाल संसार में कहीं दूसरी जगह नहीं मिल सकती थी । दलित वर्ग के लिए जिंदा रहना भी मुश्किल हो गया था । दलित वर्ग के लोग न तो अच्छे काम कर पाते थे और न दलित वर्ग मंदिरों में पूजा कर सकते थे, और न तो तालाबों में पानी पी सकते थे और न तो कई सार्वजनिक सड़कों पर पैर रख सकते थे । जबकि कुत्ता बिल्ली और अन्य जानवर के साथ ऐसा सलूक नहीं किया जाता था ।
हजारों वर्ष तक महिलायें (सभी वर्ग की) आदिवासी, दलित और पिछड़ा वर्ग, इस धार्मिक अन्याय की चक्की में पिसते रहे। देश में कई राजे-महाराजे और शासक हुए लेकिन किसी ने इस धार्मिक अन्याय को दूर करने के लिए कुछ भी प्रयास नहीं किया। क्योंकि सभी राजे महाराजे वेदों,पुराणों और धार्मिक साहित्य का बहुत आदर करते थे । इसीलिए वेदों पुराणों के खिलाफ कुछ भी कदम उठाने की साहस नहीं जुटा पाते थे, और राजाओं को यह भी बताया जाता था, कि वेद ब्रह्मा के मुख से निकले है,इसीलिए  वेदों और पुराणों की लिखी बातों को न मानने का मतलब है। ईश्वर के दिए गए आदेश को न मानना । इसीलिए इस धार्मिक और सामाजिक अन्याय को दूर करने का साहस कोई राजा या शासक नहीं कर सका ।
छत्रपति शाहू जी महाराज
छत्रपति शाहू जी महाराज
लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत में कोल्हापुर रियासत के राजा शाहूजी महाराज ने वेदों और पुराणों के खिलाफ जाने का साहस किया तथा कोल्हापुर रियायत के प्रशासन को बगैर भेदभाव के संपूर्ण प्रजा के कल्याण के लिए समर्पित किया ।
छत्रपति शाहूजी महाराज ने 26 जुलाई 1902 में एक आदेश दिया,जिसके तहत पिछड़े वर्ग तथा निर्बल वर्ग को रियासत के सरकारी दफ्तरों में नौकरियों में 50%  आरक्षण देने का प्रावधान किया था । इस तरह भारत के निर्वल वर्ग को आरक्षण मिलने की शुरुआत हुई ।
शाहू जी महाराज चाहते थे  कि बहु
जन वर्ग के लिए शिक्षा मिले इसीलिए प्रत्येक देहात में स्कूल भी खुलवाई । शाहूजी महाराज ने बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को अपनी अधूरी शिक्षा पूरी करने के लिए आर्थिक मदद देकर इंग्लैंड भेजा ताकि बाबा साहब ज्ञान अर्जित कर के देश में पिछड़े वर्ग तथा निर्बल वर्ग को सामाजिक तथा आर्थिक समानता दिला कर देश का भला कर सके ।
छत्रपति साहू जी महाराज द्वारा दिया गया आरक्षण कोल्हापुर रियायत तक ही सीमित था ।
लेकिन बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर पूरे देश में सामाजिक और आर्थिक अन्याय समाप्त कर समतामूलक समाज की स्थापना करना चाहते थे ।
Puna Pact
डॉ. अम्बेडकर तथा गांधी जी


देश में अंग्रेजों के राज को करीब 150 वर्ष  बीत चुके थे भारतीय लंबे समय से स्वराज की मांग कर रहे मैं थे जिसे पूरा करने के लिए अँग्रेज़ सरकार ने सन 1930-1931 में लंदन में गोलमेज सम्मेलन बुलाया । बाबा साहेब ने गोलमेज सम्मेलन में दलितों की तरफ से भाग लिया
गोलमेज सम्मलेन में बाबा साहब  ने अपने भाषण में कहा था:- “भारत में अंग्रेजी नौकरशाही सरकार के स्थान पर लोगों द्वारा ,लोगों के लिए, लोगों की सरकार कायम की जाये “
बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने अँग्रेज़ सरकार से भारतीय के लिए  स्वराज देने की मांग रखी तथा दलितों के लिए विधानमंडलों में अलग निर्वाचन क्षेत्र देने की मांग रखी ।
बाबा साहब का मानना था कि भारत में लोग योग्यता और शिक्षा से ज्यादा जाति देखते हैं इसलिए संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र में दलित वर्ग के उम्मीदवारों को सवर्ण और जातिवादी व्यक्ति वोट नहीं देंगे इसलिए दलित वर्ग के प्रतिनिधि विधानमंडलों में चुनकर नहीं जा पाएंगे जबकि दलित और पिछड़े वर्ग के लोग ब्राह्मण और सवर्णों को वोट देना पुण्य का काम समझेंगे इसलिए ब्राह्मण और सवर्ण जीत जाएंगे और सत्ता में आने पर स्वर्ण और दलितों पिछड़े वर्ग पर और भी ज्यादा अन्याय और अत्याचार करेंगे इसीलिए बाबा साहब ने चुनाव में दलितों के लिए ऐसे अलग चुनाव क्षेत्र की मांग रखी जिन क्षेत्रों में केवल दलित वर्ग के व्यक्ति ही चुनाव लड़ सके और केवल दलित वर्ग के व्यक्ति ही वोट डाल सकें।
बाबा साहेब अंग्रेज सरकार से ऐसा प्रावधान करने की मांग की जिससे किसी आदमी के सामने देश की सरकारी नौकरी में प्रवेश होने के संबंध में कोई बाधा न रहे । गोलमेज सम्मेलन में भाषण देते हुए बाबा साहब ने कहा था । महोदय, मेरा मत है की किसी भी एक  वर्ग को किसी देश की सारी सरकारी नौकरियों पर एकाधिकार कर लेने देना एक बड़े भारी सार्वजनिक खतरे को मोल लेने देना  है । मैं इसे सार्वजनिक खतरा कहता हूं, क्योंकि इससे जो जातियां फायदे में रहती हैं, उनके अंदर अहंकार का भाव पैदा हो जाता है। बाबा साहब ने यह भी कहा था । कि हम भारत के लिए एक नया विधान बनाने जा रहे हैं। हमें उस का आरंभ ऐसी पद्धति से करना चाहिए जिसमें महामहिम की प्रजा के हर आदमी को इस बात का अवसर हो कि वह सरकारी नौकरियों में अपनी अपनी योग्यता का परिचय दे सकें ।

सवर्णों का सरकारी नौकरियों में एकाधिकार है  जिसके चलते अन्य वर्गों की भारी उपेक्षा हो रही है। सवर्ण लोगों ने न्याय और समानता को दरकिनार कर अपने वर्ग को लाभ पहुंचाने के लिए अपने अधिकारों का दुरूपयोग किया है । सरकारी नौकरियों में सवर्णों को एकाधिकार को समाप्त करने के लिए इस प्रकार के नियम बनाया जाए जिससे की नौकरियों में भर्ती सभी संप्रदायों को उसका उचित भाग मिल सकें ।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस और गांधी ने भाग नहीं लिया लेकिन दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गांधी ने भाग लिया और अपनी गलत और अमानवीय सोच का परिचय देते हुए दलितों के लिए अलग चुनाव क्षेत्र और राजनीतिक अधिकार देने का डटकर विरोध किया । गांधी जी का कहना था कि दलित वर्ग हिंदू धर्म का ही एक हिस्सा है, इसलिए दलित वर्ग को हिंदू वर्ग से अलग नहीं किया जा सकता गांधी जी का कहना था कि मैं प्राणों की बाजी लगाकर इस तरह के राजनीतिक बंटवारे का मैं विरोध करूंगा।

गांधीजी के कड़े विरोध के बावजूद ब्रिट्रेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के तर्क पक्ष और मांग को सही मानते हुए 16 अगस्त सन 1932 को दलित वर्ग को राजनीतिक अधिकार देते हुए उन्हें विधानमंडलों में अलग निर्वाचन क्षेत्रों का प्रस्ताव मंजूर  किया । दलित वर्ग को राजनीतिक अधिकार मिलना गांधीजी को सहन नहीं हुआ । दलित वर्ग के लिए विधानमंडलों में अलग निर्वाचन क्षेत्र मिलने के विरोध में गांधी जी ने पुणे की यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया । गांधी की मांग थी दलित वर्ग को जो राजनीतिक अधिकार स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र मिले हैं । उन्हें समाप्त कर दिया जाए । यरवदा जेल में गांधीजी के अनशन के कारण पूरे देश में कांग्रेसियों ने अंबेडकर का विरोध करना शुरू कर दिया । दलितों के साथ मारपीट तथा हत्याएं आगजनी करना शुरु कर दिए । दलितों के घर आग के हवाले कर दिए गये । यह सब कांग्रेसी इसलिए कर रहे थे कि बाबा साहब अंबेडकर दलितों को मिले राजनीतिक अधिकारों को छोड़ देवें ।

कांग्रेसी बाबा साहब से गाँधी से बात करने का अनुरोध भी कर रहे थे । अंत में देश में शांति और दलितों की जान माल की रक्षा के लिए डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने पुणे की यरवदा जेल में जाकर गांधी से मुलाकात की । लंबी बातचीत के बाद डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने विधानमंडलों में मिले अलग निर्वाचन क्षेत्रों के प्रस्ताव को छोड़ दिया । और बदले में दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र के मुआवजे के रुप में गांधी की मंशा के अनुसार राजनीतिक आरक्षण स्वीकार कर लिया । समझौते के तहत  विधानमंडलों में अलग निर्वाचन क्षेत्रों की जगह सुरक्षित क्षेत्र प्रदान किए गये । यानि जो  क्षेत्र दलित वर्ग के लिए सुरक्षित रखे गए उनमें केवल दलित वर्ग के प्रत्याशी ही खड़े हो सकेंगे लेकिन सभी वर्ग के मतदाता वोट डाल सकेगें  ।

24 सितंबर सन 1932 को डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और गांधी के बीच एक समझौता हुआ जिसे पूना समझौता या पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है । इस समझौते पर दलित वर्ग की तरफ से डॉक्टर अंबेडकर तथा सवर्ण हिंदुओं की तरफ से मदन मोहन मालवीय ने हस्ताक्षर किये । इसके बाद राजनीति में आरक्षण की शुरुआत हुई और गांधी ने अपना अनशन समाप्त कर दिया । बाबा साहब का मानना था कि गांधी और कांग्रेस ने पूना  पैक्ट रुपी फल से प्राप्त रस को चूस लिया और छिलका दलितों के मुंह पर दे मारा ।
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Sunday, 9 September 2018

डॉ. अम्बेडकर और माता रमाबाई की कहानी ,जो आपको रुला के रख देगी

Dr.ambedkar and ramabai
Dr.B.R. Ambedakar and Ramabai Ambedkar

डॉ. अम्बेडकर और माता रमाबाई की कहानी ,जो आपको रुला के रख देगी

कृपया पूरी पोस्ट पढ़े।
जब बड़ौदा के महाराज ने बाबा साहब को वजीफा दिया और बाबा साहब विदेश जा कर पढ़ना चाहते थे तब उनकी पत्नी रमाबाई और 5 बच्चे थे। तो देखिए किस प्रकार से बाबा साहब अपनी बात रमाबाई के सामने रखते हैं।

बाबा साहब - रमा बड़ौदा के महाराज ने मुझे वजीफा दिया है और मैं विदेश जा कर पढ़ना चाहता हूं लेकिन जब मैं तेरी तरफ मुड़कर देखता हूं तेरे पास 5 बच्चे हैं आमदनी का कोई साधन नहीं है और मैं भी तुझे कोई पैसा देकर नहीं जा रहा हूं क्या ऐसी परिस्थिति में तू मुझे विदेश जाकर पढ़ने की अनुमति देगी।

रमाबाई - बाबा साहब यह बात सच है कि मेरे पास 5 बच्चे हैं और आमदनी का भी कोई साधन नहीं है और आप भी मुझे कोई पैसा देकर नहीं जा रहे हो लेकिन मैं आपको भरोसा दिलाती हूं आप अपनी इच्छा को पूरी करके आना आप अपनी पढ़ाई को पूरी करके आना इन 5 बच्चों का पेट मैं खुद पाल लूंगी, और जब माता रमाबाई बाबा साहब को भरोसा दिलाती हैं तो बाबासाहब विदेश चले जाते हैं और अपनी पढ़ाई करते हैं और इधर माता रमाबाई अपने 5 बच्चों के पेट को पालने के लिए क्या करती है ।

माता रमाबाई मुंबई की गलियों से गोबर उठा कर लाती उसके बाद उपले बनाकर मुंबई की गलियों में उपले बेच कर आया करती और उससे जो पैसा आ जाता अपने बच्चों का पेट पालती है ।
इतना पैसा नहीं आता था कि वह अपने बच्चों की परवरिश कर पाती देखते ही देखते उनका बड़ा बेटा दामोदर बीमार हो गया। इलाज के पैसे नहीं थे इलाज के अभाव के कारण दामोदर इस दुनिया को छोड़ कर चला गया। यह बात माता रमाबाई ने बाबा साहब को नहीं बताई।

         (बाबा साहब द्वारा भेजा गया पत्र)

नानकचंद रत्तू खत पढ़ते हुए- बाबा साहब कहते हैं । कि रमा मैं यहां अगर एक वक्त का खाना खाता हूं तब भी मेरा काम नहीं चल पा रहा है मैं अपना जीवन बड़ी मुश्किल में व्यतीत कर रहा हूं में अपना सुबह का नाश्ता दोपहर में करता हूं और शाम को मैं पानी पीकर अपना काम चला रहा हूं और मैं जानता हूं कि तेरे सामने भी बहुत विफल परिस्थितियां हैं तेरे पास पांच बच्चे हैं  और आमदनी का भी कोई साधन नहीं है फिर भी अगर हो सके तो कुछ पैसा भिजवा देना

इधर माता रमाबाई ने बड़ी मुश्किल से कुछ पैसा इकट्ठा किये थे। लेकिन उनकी बेटी इंदु बीमार हो जाती है अब माता रमाबाई के सामने एक बहुत बड़ा सवाल था कि वे उस पैसे से अपनी बेटी का इलाज कराएं या अपने पति को दिए गए वचन को निभाएं लेकिन एक मां ने फैसला किया और वह पैसा बाबा साहब को भेज दिया और इधर उनकी बेटी इंदू ने भी दम तोड़ दिया और यह बात भी माता रमाबाई ने बाबा साहब को नहीं बताई और बाबा साहब पढ़ते रहे और कुछ समय के बाद बाबा साहब अपनी पढ़ाई छोड़कर बड़ौदा के महाराज की रियासत में नौकरी करने के लिए आते हैं तो रमाबाई खुश होती है और क्या कहती है।

रमाबाई - अब तो मेरा पति डॉक्टर बन के आ रहा है अब मेरा पति नौकरी करेगा तनखा कमा कर लाएगा अब तो अपने बच्चों को मैं भरपेट खाना खिलाऊंगी अब तो मेरी जिंदगी के दिन बदल जाएंगे।

बाबा साहब जब दफ्तर में प्रवेश करते हैं।

चपरासी - टाट को खींच लेता है और पानी के घड़े को उठाकर अलग रख देता है ।

बाबा साहब - अरे चपरासी  जरा मुझे फाइल तो लाकर देना
चपरासी - फाइल को भी डंडे से उठा कर देता है।
बाबा साहब क्या बदतमीजी है यह क्या हो रहा है तू एक चपरासी होकर मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है।

चपरासी - अंबेडकर तुम पढ़-लिख जरूर गए हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि तुम हमारी बराबरी पर आ गए हो तुम आज भी नीच हो और तुम्हारे साथ में काम करके अपना धर्म नष्ट नहीं कर सकता

बाबा साहब - क्या मतलब मेरे साथ तेरा धर्म कैसे नष्ट हो सकता है और तू जानता है कि मैं तुझे नौकरी से निकाल सकता हूं ।

चपरासी - अंबेडकर यह बात में अच्छे से जानता हूं और तुम मुझे नौकरी से भले ही निकाल दो लेकिन मैं तुम्हारे साथ रहकर इस दफ्तर में काम नहीं कर सकता।

बाबा साहब मैं ऐसे अपमानजनक स्थान पर और अधिक नौकरी नहीं कर सकता।

संचालक - बाबा साहब ने 11वें ही दिन अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और अपने घर के लिए निकलते हैं और बड़ौदा के रेलवे स्टेशन पर पहुंच जाते हैं वहां उनकी ट्रेन 4 घंटे लेट होती है तो बाबा साहब एक पेड़ के नीचे बैठ जाते हैं और क्या कहते हैं।

बाबा साहब - मैं पहले यह सोचता था कि हमारे लोग मरे पशुओं को उठाते हैं उनकी खाल खींचते हैं और उनका मांस खाते हैं हमारे लोग दूसरों की टट्टी को अपने सर ऊपर उठाकर फेंकने का काम करते हैं मेरे लोग गंदे रहते हैं उनके पास पहनने के लिए अच्छे कपड़े नहीं है और उनके पास पैसा भी नहीं है तो हो सकता है यह लोग हमारे लोगों से इसलिए ऐसा व्यवहार करते हैं हो सकता है  यह लोग हमारे लोगों को इसीलिए नीच कहते है लेकिन आज तो मैंने यूरोप के कपड़े पहने हैं अमेरिका और जापान की यूनिवर्सिटियों से शिक्षा प्राप्त की है और एक अधिकारी बनकर मैं यहां आया हूं जब ये मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं तो जो मेरे समाज के अशिक्षित और अनपढ़ लोग हैं तो ये लोग उनके साथ कैसा व्यवहार करते होंगे (रोते हुए) अगर मैं अपने समाज को इस ग़ुरबत और गुलामी से आजाद नहीं करा पाया तो मैं वापस बड़ौदा लौट कर नहीं आऊंगा और मैं खुद को गोली मार लूंगा।

बाबा साहब जब नौकरी छोड़कर अपने घर पहुंचते हैं और यह बात रमाबाई को पता चलती है तो रमाबाई को बहुत दुख होता है।

बाबा साहब - रमा मैं नौकरी तो करना चाहता था लेकिन वहां का चपरासी मुझे फाइल डंडे में बांध कर देता पानी के घड़े को उठाकर अलग रख लेता और वहां के लोगों ने भी मुझे मारने की योजना बनाई मैं ऐसे अपमानजनक स्थान पर नौकरी नहीं कर सकता था इसीलिए मैं नौकरी छोड़ कर चला आया।

रमाबाई - बाबा साहब आपको जैसा अच्छा लगे आप वैसा ही काम करें मैं आपके साथ हूं।

फिर बाबा साहब को अपनी अधूरी पढ़ाई और बड़ौदा रेलवे स्टेशन पर लिए गए संकल्प का ख्याल आता है तो बाबा साहब फिर से विदेश जाकर हम सब की गुलामी का कारण जो हिंदू धर्म के ग्रंथों में लिखा हुआ है उसे खोजते हैं इधर उनका तीसरा बेटा रमेश भी इस दुनिया को छोड़ कर चला जाता है इस प्रकार से बाबा साहब के तीन बच्चे कुर्बान हो जाते हैं। और जब बाबा साहब विदेश से लौट कर आते हैं और हमारी गुलामी व नीचता का कारण हमें बताते हैं।

बाबा साहब - मैं कड़ी मेहनत और लगन से यह जान पाया हूं। कि हमारे समाज के लोगों के साथ जो नीचता भरा और गुलामी का व्यवहार हो रहा है उसका कारण हिंदू धर्म के जो ग्रंथ हैं उनमें लिखा हुआ है और मैं आज यह घोषणा करता हूं कि 25 दिसंबर सन 1927 को पूरी देश की मीडिया को सूचना देकर इस हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ को अग्नि की भेंट चढ़ा कर आप सब को आजाद कर दूंगा।

संचालक - और बाबा साहब 25 दिसंबर सन 1927 को हजारों लाखों की संख्या के सामने हिंदू धर्म के ग्रंथों को वह मनुस्मृति को अग्नि की भेंट चढ़ा कर आप सबको हम सबको इस नीचता और जिल्लत भरी जिंदगी से आजाद करते हैं और कहते हैं ।

25 दिसंबर 1927
बाबा साहब - मैं ऐसी किसी भी बात को नहीं मान सकता जो अमानवीय है और आज के बाद ऐसा कोई भी विधान  व कोई भी कानून मेरे समाज के लोगों पर लागू नहीं होगा जो अमानवीय है क्योंकि यह विधान जबरजस्ती हमारे समाज के लोगों पर थोपा गया हैं।

ऐसा कहकर बाबा साहब मनुस्मृति को अग्नि की भेंट चढ़ा देते हैं और आप सबको आजाद करा देते हैं उसके बाद बाबा साहब मुंबई की कोर्ट में वकालत करते हैं तो उनका जो चौथा बेटा होता है राजरतन वह बीमार हो जाता है देखिए वह दृश्य।

रमाबाई - नानकचंद रत्तू जाओ जल्दी से बाबा साहब को बुलाकर लाओ क्योंकि हमारा जो बेटा है राजरतन वह बहुत बीमार है और वह लंबी लंबी सांसे ले रहा है।

नानकचंद रत्तू - बाबा साहब बाबा साहब जल्दी से घर चलिए आपके पुत्र राजरतन की तबीयत बहुत खराब है और माता रमाबाई ने आपके लिए बुलावा भेजा है।

संचालक - जैसे ही बाबा साहब दौड़कर घर पहुंचते हैं और राजरतन को गोदी में लेते हैं तो राजरतन भी दम तोड़ देता है अपने चौथे बेटे की मौत पर पति के सामने माता रमाबाई क्या कहती हैं।

रमाबाई - रोते हुए बाबा साहब बस करो बाबा साहब अब तो बस करो क्योंकि आपके समाज सुधार की लालसा ने और ज्ञान पाने की लालसा ने मेरा पूरा घर उजाड़ के रख दिया है मैंने एक एक करके अपने 4 बच्चों को दफन कर दिया है बाबा साहब अब तो बस करो ।

बाबा साहब - रमा तू तो मुझे रो करके बता पा रही है मैं तो रो भी नहीं पा रहा हूं मैं तो रोज ऐसे सैकड़ों बच्चों को मरते हुए देखता हूं रमा तू चुप हो जा, रमा तू चुप हो जा।

रमाबाई - बाबा साहब मैंने आज तक आपकी हर बात को माना है और इस बात को भी मान लेती हूं और चुप हो जाती हूं लेकिन आप मुझे इतना बता दो कि आप बड़े फक्र से कहते थे कि तेरा बेटा राज रतन देश पर राज करेगा लेकिन अब यह इस दुनिया में नहीं रहा बताओ यह कैसे इस देश पर राज करेगा बाबा साहब मुझे बता दो कि यह कैसे देश पर राज करेगा।

बाबा साहब - रमा यह सच है कि तेरा यह पुत्र अब इस दुनिया में नहीं रहा लेकिन मैं तुझे भरोसा दिलाता हूं और राजरतन के पार्थिव शरीर की सौगंध खाकर कहता हूं कि मैं अपने जीवन में ऐसा काम करके जाऊंगा कि हर रमा की कोख से पैदा हुआ राजरतन और हर मां की कोख से पैदा हुआ बेटा इस देश पर राज करेगा मैं तुझे भरोसा दिलाता हूं।

इतना कहने के बाद बाबा साहब अपनी जेबों में हाथ डालते हैं और राजरतन के कफन के लिए उन की जेब में एक पैसा तक नहीं होता है इस बात को माता रमाबाई जानती है और रमाबाई अपनी साड़ी का दुपट्टा पार कर राजरतन के ऊपर डाल देती है और बाबा साहब को ख्याल आता आता है कि मुझे गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन जाना है और बाबा साहब राजरतन के पार्थिव शरीर को छोड़ घर पर ही छोड़ कर लंदन के लिए निकलते हैं तभी पीछे से उनका भाई दौड़कर आता है और कहता है।

भाई - भीम तू पागल हो गया है यह तेरा पुत्र मरा पड़ा है और तुझे विदेश जाने की सूझ रही है तू कैसा बाप है जो अपने पुत्र को इस अवस्था में छोड़कर विदेश जा रहा है और यह समाज क्या कहेगा अपने पुत्र को कंधा देकर उसका अंतिम क्रिया कर्म तो कर ले।

बाबा साहब - भाई मैं जानता हूं कि यह मेरा पुत्र मरा पड़ा है लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि अगर आज मैं गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन नहीं गया तो गांधी एंड कंपनी के लोग मेरे करोड़ों करोड़ों लोगों को मार डालेंगे के सारे और हक अधिकारों को छीन लेंगे इसलिए मैं एक पुत्र की खातिर अपने करोड़ों करोड़ों लोगों को बलि चढ़ते हुए नहीं देख सकता यहां तुम सब लोग हो तुम सब संभाल लोगे ।

ऐसा कहते हुए बाबा साहब गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन चले जाते हैं और आज आपके जो बच्चे हैं आपका जो समाज है जो हक और अधिकार लेकर जी रहा है अपने बच्चों को अच्छे अच्छे कपड़े अच्छी अच्छी शिक्षा और नौकरियों में भेज रहा है इसका श्रेय केवल और केवल बाबा साहब को जाता है और आपके जो लोग हैं वह इस बात को अपने बच्चों को बताने तक शर्माते हैं।

(JAY BHIM JAY BHARAT)

Tuesday, 14 August 2018

आखिर 15 अगस्त क्यों मनाया जाता है..

National Flag
National flag

आखिर 15 अगस्त क्यों मनाया जाता है:-

15 अगस्त जुबान पर आते ही या सुनाई देते ही तिरंगे झंडे का चित्र मस्तिष्क Brain में उभर आता है क्योंकि जितना संबंध प्यास पानी का है,जितना संबंध भूख और रोटी है, उतना संबंध 15 अगस्त और तिरंगे झंडे का है,15 अगस्त सुनते ही याद आ जाता है ,कि किस तरह स्कूल के दिनों में स्कूल में 15 अगस्त मनाया जाता था, 15 अगस्त की तैयारी स्कूल में कुछ दिन पहले से शुरू हो जाती थी,स्कूल का ग्राउंड की पहले से साफ-सफाई कर दी जाती थी ,15 अगस्त के दिन सुबह सुबह रैली Raily निकाली जाती थी, जिसमें भारत माता की जय ,आज क्या है 15 अगस्त, देश की रक्षा कौन करेंगे हम करेंगे हम करेंगे, देश के वीर जवानों की जय आदि नारे लगाए जाते थे, झंडा वंदन और Culture Program के बाद खुशी-खुशी सब अपने अपने घर आ जाते थे ।
सन 1608 में अंग्रेजों का पहला जहाज सूरत बंदरगाह पर आया और 1613 ईसवी में सुल्तान जहांगीर ने अंग्रेजों को सूरत में फैक्ट्री खोलने की इजाजत दे दी, तथा व्यापार करने का अधिकार दे दिया, सन 1757 में प्लासी युद्ध में अंग्रजों ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हरा दिया और भारत में अंग्रेजी शासन की शुरुआत हुई ,अंग्रेजों ने अपनी कूटनीति Diplomacy से फूट डालकर धीरे धीरे पूरे देश पर कब्जा कर लिया ।

अंग्रेजों का शासन हो जाने के बाद अंग्रेजों ने देश में अपने हिसाब से शासन करना शुरू कर दिया, अंग्रेजी में ऐसे काम किए, जिससे लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होने लगी , 1829 में राजाराम मोहन राय की मांग पर अंग्रेजों ने सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया, अंग्रेजी सरकार ने ऐसे कारतूस बनवाए थे जिसमें गाय और सूअर की चर्बी मिली हुई थी, और उन कारतूसों को दांतो से छीलना पड़ता था । 1857 में सैनकों ने इन कारतूसों के उपयोग करने से इंकार कर दिया ।उनमें मंगल पांडे मुख्य थे ,जिसके परिणाम स्वरुप मंगल पांडे को हथियार छीनने और वर्दी उतारने का हुक्म दिया जिससे क्रोधित होकर मंगल पांडे ने अंग्रेज मेजर को मौत के घाट उतार दिया । 8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे को फांसी दे दी गई । जिसके बाद अंग्रेजों के विरुद्ध सैनिक विद्रोह भाग गया, यह विद्रोह दिल्ली मेरठ झांसी कई जगहों पर फैल गया । अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबा दिया लेकिन विद्रोह की आग 90 वर्षों तक भड़कती रही और अंत में 15 अगस्त 1947 को देश छोड़ना पड़ा ।
अंग्रेजों British के शासन से आजादी पाने के लिए मातादीन भंगी, मंगल पांडे,खुदीराम बोस, भगत सिंह, उधम सिंह सुखदेव, राजगुरु हजारों देशभक्तों को अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया । चंद्रशेखर आजाद जैसे हजार क्रांतिकारियों को गोली मार दी , महात्मा गांधी जवाहरलाल नेहरु वल्लभभाई पटेल जैसे हजारों देशभक्तों को जेल की सजा भुगतनी पड़ी तब जाकर अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा । 15 अगस्त का राष्ट्रीय त्योहार (National festival) मनाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । लेकिन यह आज़ादी केवल नाम की आज़ादी थी ,असल मे सही आज़ादी तब मिली जब डॉ. बाबा साहब अंबेडकर ने संविधान Constitution लिखा और देश के सभी नागरिकों Citizens को हक़ अधिकार दिये तब सच्चे मायनो में आज़ादी मिली ।

Saturday, 4 August 2018

वैदिक धर्म तथा वर्धमान महावीर स्वामी

वैदिक धर्म तथा वर्धमान महावीर स्वामी

वैदिक धर्म तथा वर्धमान महावीर स्वामी
ऋग्वेद को World का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है इतिहासकारों के अनुसार ऋग्वेद की रचना संभवतः 1500 पूर्व से 1000 ईसा पूर्व के मध्य की गई होगी, इसके बाद में 1500  ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व में अन्य तीन वेदों की रचना हुई होगी वेदों की संख्या 4 है ऋग्वेद ,यजुर्वेद, सामवेद, अर्थवेद  ऋग्वेद से मिलता जुलता ग्रंथ ईरान में भी पाया जाता है, जिसका नाम अवेस्ता Avestan ग्रंथ है , डॉ. राधा कुमुंद के अनुसार “ ऋग्वेद और अवेस्ता  में इतनी अधिक समानता है कि पूरे अनुच्छेद के अनुच्छेद भारतीय भाषा में बिना किसी शब्द अथवा बनावट के अनुसार किये जा सकते है ।”
 हिंदू धर्म में वेदों का अत्यधिक महत्व है, वेदों (The Vedas) को प्रमाणिक ग्रंथ मानी जाती है, यानि वेदों में लिखी हर एक बात पूर्ण रुप से सत्य माना जाता हैं। ऐसा माना जाता है कि, जिस प्रकार संसार (World) की वस्तुओं को देखने के लिए आंखों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार अलौकिक (Superhuman दूसरे संसार) तथ्यों को जानने के लिए वेदों की आवश्यकता होती हैं। वेदों में विश्वास नहीं रखने वालों को और वेदों की निंदा करने वालों को नास्तिक कहा जाता है। वेदों को प्रमाणिक ग्रंथ Texts मानकर ही पुराणो और रामायण, महाभारत की रचना की गई, इसलिए वेदों और महाकाव्य Epic को वेदों का अंग माना गया है। वेदों में ऐसे कई सिद्धांतों को माना गया है जिनका हिंदू धर्म (ब्राह्मण धर्म) को मानने वालों व्यक्ति पालन करते हैं उन सिद्धांतों Principle में मुख्य सिद्धांत हैं।
  1. वेदों की रचना ईश्वरकृत (Devoted) है, वेद ब्रह्मा के मुख से निकले हैं।
  2. चूंकि वेद ब्रह्मा के मुख से निकले हैं इसलिए वेदों के किसी एक शब्द पर भी प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता ।
  3. संसार (ब्रह्मांड) की रचना, ब्रह्मा ने की है।
  4. ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, पेट से वैश्य, और पैरों से शूद्रों की उत्पत्ति  origin हुई है। इसीलिए ब्राह्मण वर्ग सबसे ऊंचा और श्रेष्ठ है क्षत्रिय ब्राह्मण से नीचे किंतु वैश्यों से ऊपर, वैश्य क्षत्रियों से नीचे और शूद्रों से ऊपर हैं। चारों वर्णों में शूद्र Shudra सबसे नीचे माने जाते हैं।
  5. वेदों के अनुसार ब्राह्मण (Brahman) का काम पढ़ना पढ़ाना और धार्मिक संस्कार करना, क्षत्रियों का काम राज्य करना तथा रक्षा करना, वैश्यों का काम व्यापार करना तथा शूद्रों का एक मात्र काम तीनों वर्णों की सेवा करना।
  6. वेदों के अनुसार शूद्रों तथा ब्राह्मण सहित सभी वर्ग की महिलाओं (Lady's) को पढ़ने लिखने का तथा उपनयन संस्कार करने का अधिकार नहीं है।
  7. वेदों के अनुसार व्यक्ति का जन्म पिछले जन्म Previous Birth के कर्मों के अनुसार उच्च तथा निम्न कुल में होता है ।
  8. आत्मा की मुक्ति या मोक्ष की प्राप्ति वैदिक यज्ञ करने में पशुओं की बलि देने तथा दूसरी धार्मिक क्रियाओं के करने तथा ब्राह्मणों को दान देने से होती है।
वेदों की आलोचना करने वालों को भले ही नास्तिक Atheist कहा गया है, लेकिन देश में बहुत प्राचीन काल से वेदों की आलोचना करने वाले तथा वेदों को प्रमाण न मानने वाले संत महात्माओं का जन्म होता रहा है जो हिंदू धर्म (ब्राह्मण धर्म) से विद्रोह Revolt कर हिंदू धर्म (ब्राह्मण धर्म) से अलग स्वतंत्र पंथ( धर्म )बनाते रहे है।
7वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक भारत में वैदिक धर्म Vedic Religion का बोलबाला था, वर्ण व्यवस्था का बहुत ही कड़ाई से पालन किया जाता था । राजा और शासक लोग वैदिक रीति से ब्राह्मणों और राज गुरुओं के निर्देशानुसार राज्य किया करते थे । यज्ञ में पशुओं की बलि ( Animal sacrifice) दी जाती थी अंधविश्वास और कर्मकांडों का बोलबाला था छुआछूत का पालन किया जाता था अछूतों Untouchables की छाया से भी दूर रहा जाता था ।
 ऐसे समय में 599 ईसापूर्व में जैन धर्म के संस्थापक वर्धमान महावीर Mahavir का जन्म हुआ, महावीर स्वामी वेदों को प्रमाणिक ग्रंथ मानने से इनकार करते थे,महावीर स्वामी के वेदों से हटकर अपने स्वतंत्र विचार थे यज्ञों में पशुओं की बलि देने के वें सख्त खिलाफ थे, महावीर स्वामी चाहते थे कि सभी जीवों को जीने का अधिकार हो, इसीलिए सभी लोगों को हिंसा से दूर रहना चाहिए उनके उपदेशों Precepts का लोगों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। और उस गहरे प्रभाव के कारण लोगों का वैदिक धर्म से मोह-भंग हो गया तथा कई राजा और शासक वर्धमान महावीर स्वामी के वे शिष्य बन गए, महावीर स्वामी के उपदेशों और शिक्षाओं को प्रमाण Proof मानने वाले व्यक्ति जैन कहलाने लगे बाद में जैन पंथ Jain cult ब्राह्मण धर्म से अलग स्वतंत्र पंथ धर्म के रूप में स्थापित हो गया ।